गुप्त वंश एवं इसका महत्व

 ३२० ईस्वी से ४९५ ईस्वी तक गुप्त शासकों का एक लंबा संग्रह भारतीय इतिहास ( Bharat Ka Itihas )पर हावी रहा, जिसे 'गुप्त-वंश' कहा जाता है। इसे भारतीय पुनर्जागरण का युग और भारतीय इतिहास का स्वर्ण युग भी कहा जाता है। मौर्य शासन के विनाश के बाद भारत की राजनीतिक एकजुटता क्षतिग्रस्त हो गई, कि इस युग में राजनीतिक एकता पुनर्जीवित हो गई। इस वंश के सभी शासकों के नामों के पद छोड़ने पर 'गुप्त' शब्द प्रत्यय के रूप में प्रयुक्त होता है, जो इन शासकों की जाति या वंश का सूचक है। इसलिए इस वंश को गुप्त वंश कहा जाता है।

गुप्त वंश की उत्पत्ति

गुप्तों की शुरुआत का स्थान: इतिहासकारों में गुप्त वंश की शुरुआत के क्षेत्र के बारे में कोई आम सहमति नहीं है। बाद के चीनी लेखक इटिंग के विवरण के आधार पर कुछ इतिहासकार मगध को गुप्तों की उत्पत्ति के रूप में नहीं भूलते हैं। कुछ इतिहासकार प्रयाग-साकेत-अवध के स्थान को गुप्तों का प्रामाणिक क्षेत्र मानते हैं। प्रयाग से समुद्रगुप्त की प्रशंसा प्राप्त होना इसका प्रमाण माना जाता है, लेकिन प्रयाग प्रशस्ति सहित किसी भी लेख में गुप्त शासकों और उनके अधिकारियों ने गुप्तों के मूल स्थान का उल्लेख नहीं किया है।

गुप्त वंश का महत्व

गुप्त-राज्य की स्थापना के साथ ही भारत के ऐतिहासिक इतिहास ( Prachin Bharat Ka itihas )के भीतर एक नई पीढ़ी का आरंभ होता है, जिसका राजनीतिक, ऐतिहासिक, आर्थिक, धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से उत्कृष्ट महत्व है।

(१) ऐतिहासिक महत्व: 

गुप्त-वंश का शासन हमें ऐतिहासिक तथ्यों के अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है। कुषाण साम्राज्य के विनाश और गुप्त साम्राज्य के ऊर्ध्वगामी दबाव के बीच का काल इतिहास की दृष्टि से काला माना जाता है, हालांकि गुप्त काल के प्रारंभ में यह अंधकार समाप्त हो जाता है और व्यवस्थित इतिहास प्राप्त होता है।

(२) राजनीतिक महत्व: 

अशोक की मृत्यु के बाद, विशाल मौर्य साम्राज्य नष्ट और भ्रष्ट हो गया और भारत की राजनीतिक एकजुटता समाप्त हो गई, जिसके कारण देशी और विदेशी राज्यों को संयुक्त राज्य के विभिन्न घटकों में जोड़ा गया है। अमेरिका, जिसमें लगातार संघर्ष चल रहा था। था। राजस्थान, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और पंजाब में कई गणराज्य प्रभावी हो गए हैं।

(3) आर्थिक महत्व: 

गुप्त-सम्राटों ने पूरे देश में एक छत्र साम्राज्य स्थापित किया। एस । और उसमें शांति-व्यवस्था स्थापित की और लोक कल्याणकारी कार्यों के सहयोग से प्रजा को समृद्ध बनाया। गुप्त काल भारत के लिए अनसुनी समृद्धि की पीढ़ी में बदल गया। इस युग के किसी बिंदु पर भारत के विदेशी राष्ट्रों के साथ घनिष्ठ विनिमय संबंध स्थापित किए गए थे।

(4) धार्मिक महत्व:

इस काल में ब्राह्मण-धर्म का विकास हुआ। गुप्त सम्राटों ने ब्राह्मण धर्म को राजकीय धर्म बनाकर कवर किया और अश्वमेध यज्ञ में भाग लेने लगे। इससे ब्राह्मण धर्म को बहुत अच्छा प्रोत्साहन मिला और यह तीव्र गति से आगे बढ़ने लगा।

(5) सांस्कृतिक महत्व: 

ब्राह्मण-धर्म का संस्कृत भाषा के साथ एक अटूट संबंध है। चूंकि गुप्त काल की अवधि के लिए ब्राह्मण-विश्वास आगे बढ़ा, इसलिए संस्कृत भाषा में भी सुधार हुआ। वस्तुतः गुप्त काल संस्कृत भाषा के चरमोत्कर्ष की अवधि है। इस अवधि के दौरान, साहित्य और कला में बहुत अच्छी प्रगति हुई और भारत की सभ्यता और जीवन शैली को विदेशों में बड़े पैमाने पर प्रचारित किया गया।

जानिए अपने Adhunik Bharat Ka Itihas - विश्व इतिहास का गौरव

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